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उदयपुर पॉक्सो कोर्ट सख्त: नाबालिग रेप केस में जांच लापरवाही पर 2 DSP के खिलाफ कार्रवाई के आदेश

उदयपुर की पॉक्सो कोर्ट-2 ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में पुलिस जांच में बरती गई गंभीर लापरवाही को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने मामले में जांच अधिकारी रहे डीएसपी शिप्रा राजावत और डीएसपी तपेंद्र मीणा के खिलाफ विभागीय दंडात्मक कार्रवाई के लिए पुलिस उच्चाधिकारियों को पत्र लिखने के आदेश दिए हैं।

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2023 में दर्ज हुआ था मामला
प्रकरण के अनुसार, 27 मार्च 2023 को सूरजपोल थाने में एक महिला ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि 21 मार्च की रात उसकी 17 वर्षीय बेटी के साथ नाथूलाल नामक व्यक्ति ने दुष्कर्म किया।

जांच में लापरवाही, केस बताया झूठा
मामले की शुरुआती जांच डीएसपी तपेंद्र मीणा और बाद में डीएसपी शिप्रा राजावत ने की। जांच के अंत में पुलिस ने केस को झूठा बताते हुए कोर्ट में अंतिम रिपोर्ट (एफआर) पेश कर दी।

पीड़िता पक्ष ने लगाए गंभीर आरोप

सुनवाई के दौरान पीड़िता की मां ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने उन्हें न्याय दिलाने के बजाय प्रताड़ित किया। आरोप है कि थाने में महिला अधिकारी ने उनकी सुनवाई नहीं की और नाबालिग को बार-बार बुलाकर धमकाया गया तथा उसके बयान बदलवाए गए।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी—पॉक्सो एक्ट की अनदेखी
पॉक्सो कोर्ट-2 के न्यायाधीश संजय कुमार भटनागर ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि जांच अधिकारियों ने आरोपी को न तो गिरफ्तार किया और न ही उसका मेडिकल परीक्षण कराया। घटना स्थल का मौका नक्शा बनाने, पीड़िता के बयान दर्ज करने और साक्ष्य जुटाने में भी देरी की गई। यहां तक कि आरोपी के रक्त नमूनों की जांच तक नहीं कराई गई। कोर्ट ने यह भी माना कि पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों के विपरीत नाबालिग पीड़िता को बिना अनुमति बार-बार थाने बुलाया गया, जिससे उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

मजबूरी में पीछे हटा परिवार
अदालत ने माना कि पुलिस की लापरवाही और प्रताड़ना के चलते पीड़िता की मां को मजबूरी में कार्रवाई से पीछे हटना पड़ा। चार साल तक ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण परिवार ने नाबालिग की शादी कर दी।

एफआर स्वीकार, फिर भी कार्रवाई के आदेश
हालांकि पीड़िता की वर्तमान इच्छा को देखते हुए कोर्ट ने अंतिम रिपोर्ट (एफआर) स्वीकार कर ली, लेकिन जांच अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए दोनों डीएसपी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश जारी किए हैं। यह फैसला पुलिस जांच की जवाबदेही और पॉक्सो जैसे संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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